शिक्षण में श्रव्य दृश्य सामग्री

शिक्षण में श्रव्य दृश्य सामग्री : प्रत्येक शिक्षशास्त्री तथा मनोवैज्ञानिक ने दृश्य – श्रव्य सामग्री की उयोगिता को स्वीकार किया है। विशेषकर छोटी कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाये जाने वाले चार्ट, चित्र, माँडल उसकी रूची में वृद्धि करते हैं। बच्चा जिस वस्तु को एक बार देख लेता है उसे कभी नहीं भूलता। दृश्य का अर्थ है – जिसे देखा जा सके और श्रव्य का अर्थ है – जिसे सुना जा सके। अतः दृश्य – श्रव्य सामग्री का सम्बन्ध उन उपकरणों तथा माध्यमों से है जिसके द्वारा विद्यार्थी देखकर व सुनकर ज्ञान प्राप्त करते हैं। 

इस संदर्भ एवं वस्तुओं का सम्बन्ध सरलतापूर्वक जुड़ जाता है। बालकों के समय की बचत होती है। उनकी सहायता से सरल परन्तु सही बातों का पता चलता है।” 

दृश्य – श्रव्य सामग्री का महत्व – प्रत्येक कक्षा में द्वश्य – श्रव्य सामग्री का विशेष महत्व होता है। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में इसकी उपयोगिता निम्नलिखित है – 

  1. ध्यान केन्द्रित करना – विद्यार्थियों का कक्षा में ध्यान केन्द्रित करना शिक्षक का पहला कर्तव्य होता है। छोटी कक्षाओं में बच्चों का मन बहुत चंचल होता है। वह इधर-उधर भागता रहता है। ऐसे में सहायक सामग्री यानी दृश्य – श्रव्य सामग्री का उपयोग ही बच्चों का ध्यान केन्दित करता है। 
  2. अभिप्रेरणा – किसी भी कार्य को करने या सीखने के लिए अभिप्रेरणा का होना अति आवश्यक है। दृश्य – श्रव्य सामग्री भी आभिप्रेरणा का काम करती हेै, क्योंकि जैसे ही अध्यापक चार्ट, माँडल आदि लेकर कक्षा में प्रवेश करता है,  बालक उसे देखने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। 
  3. नवीनता – दृश्य – श्रव्य सामग्री द्वारा पढ़ने के ढंग में नवीनता आती है और बच्चे उस विषय को आसानी से समझ लेते हैं। 
  4. अधिगम को बढ़ावा मिलना – दृश्य-श्रव्य साधनों के उपयोग द्वारा कठिन – से – कठिन – विषय – वस्तु भी सरल, स्पष्ट व सार्थक बन जाते हैं जिससे बालक नये शाब्दों, अपरिचित बातों को शीघ्र सीख लेता है। इससे अधिगम को बढ़ावा मिलता है। 
  5. शब्द – भण्डार में वृद्धि – दृश्य – श्रव्य सामग्री को दिखाते समय अध्यापक नये – नये शब्दों का उपयोग करता है और विद्यार्थी भी इन शब्दों को सुनता, पढ़ता व याद करता है। इसके बालक के शब्द – भण्डार में वृद्धि होती हेै। 
  6. शिक्षण में कुशलता – निशक्षण में कुशलता का मतलब है क्योंकि इसके उपयोग से शिक्षक में आंत्मविश्वास, कुशलता की भावना आती है जिससे वे पाठ्य वस्तु को अधिक रूचिकर बनाने का प्रयत्न करते हैं। 
  7. ज्ञानेन्द्रियों का प्रभावपूर्ण प्रयोग – कक्षा में किसी भी पाठ्य – वस्तु को सीखने के लिए यह अति आवश्यक है कि विद्यार्थी अपनी अधिक से अधिक इन्द्रियों का उपयोग करें अर्थात् वह पूर्ण रूप से सक्रिय रहे। कहाँ भी है कि इन्द्रियाँ ज्ञान का द्वारा होते है। 
  8. बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए उपयोगी – हमारे देश की संख्या दिन- प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। दूसरी तरफ राष्ट्रीय चेतना व जाग्रति के परिणामस्वरूप कक्षा में छात्रों की संख्या में निरन्तर तेजी से वृद्धि हो रही है। ऐसे में सभी बच्चों को पाठ्य वस्तु सही ढंग से समझाने के लिए दृश्य – श्रव्य सामग्री महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  9. समय और शक्ति की बचत – किसी भी कठिन विषयवस्तु को कम समय में व अच्छी तरह समझने में दृश्य – श्रव्य सामग्री अपना बहुत महत्व रखती है। किसी चार्ट, माँडल आदि की सहायता से हम कठिन – से – कठिन विषय क्स्तु को कम समय में बच्चों को समझा सकते हेै जिससे समय की बचत होने के साथ बच्चों की शक्ति की भी बचत होती है। 
  10. रोचक व सरल शिक्षण – श्रव्य- दृश्य सामग्री शिक्षण को सरल व रोचक बनाती है। इसके द्वारा सभी विषय बड़े आसानी से पढ़ाये जा सकते हैं। 
  11. शिक्षण में विविधता – यदि शिक्षण किसी एक ही विधि द्वारा दिया जाएगा तों उसमें एकरूपता रंहेगी। वह छात्रों के लिए नीरस हो जाएगी। परन्तु श्रव्य – दृश्य सामग्री के कारण शिक्षण में विविधता उत्पन्न 
  12. पासस्परिक सहयोग भावना का विकास – जब अध्यापक छात्रों के सहयोग से श्रव्य-दृश्य सामग्री का प्रयोग करता है तो छात्र भी अपनी भागीदारी के महत्व को समझने लगते हैं और उनमें परस्पर सहयोग की भावना विकसित होती है। 
  13. छात्रों में अनुशासन – कक्षा में छात्रों का मानसिक स्तर अलग प्रकार का होता है, जिससे कक्षा में अनुशासन स्थापित होता है और अध्यापक सफलतापूर्वक शिक्षण कार्य कर सकता है। 
  14. सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान – श्रव्य सामग्री सभ्यता और संस्कृति का दर्पण कही गई है। चलचित्र, चित्र, रेडियों, शिक्षाप्रद यात्राए, दूसर्शन, नाटक आदि के माध्यम से विद्यार्थी समाज के रीति – रिवाज, खान – पान वेशभूषा आदि का ज्ञान प्राप्त काते हैं और अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से परिचित हो जाते हैं। 
  15. मानसिक शक्तियों का विकास – सामान्य शिक्षण पद्धति से विद्यार्थी की मानसिक शकितयों का समुचित विकास नहीं हो पाता, लेकिन श्रव्य- दृश्य साधनों का प्रयोग करने से छात्रों की काल्पना शक्ति, तर्कशित, निरीक्षण शक्ति तथा विचार शक्ति का विकास होता है। 

द्वश्य – श्रव्य साधन के एडगार डेल के अनुभवों के त्रिकोण का अर्थ है – प्रभावशाली शिक्षण अधिगम के लिए वास्तविक अनुभावों को अपनाना चाहिए। डेल का कहना है कि व्यक्ति के प्रत्यक्ष तथा व्यक्तिगत अनुभवों, से बढ़कर अन्य किसी प्रकार का सम्प्रेषण प्रारूप उचित नहीं होता। उनका यह भी कहना है कि यदि किसी कारण से विद्यार्थियों के वास्तिक प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। उनका यह भी कहना है कि यदि किसी कारण से विद्याथियों के वास्तिक प्रत्यक्ष अनुभव नहीं दिए जा सकते तो ऐसी स्थिति में बनांवटी अनुभवों की सहायता ली जा सकती है। इसके लिए श्यामपटट् चित्र, कार्टून, चार्ट आदि का प्रयोग किया जा सकता है। 

एडगर डेल द्वारा बनाये गये दृश्य – श्रव्य साधनों का उल्लेख इस  प्रकार है। 

  1. मौखिक
  2. दृश्यात्मक संकेत
  3. रेडियों प्रसारण 
  4. शांत चलचित्र
  5. प्रदर्शन सामग्री 
  6. चलचित्र 
  7. क्षेत्र भ्रमण 
  8. प्रदर्शन 
  9. अभिनय करना 
  10. अयोजित बनावटी अनुभव
  11. वास्तविक प्रत्यक्ष अनुभव 

सहायक सामग्री का उपयोग करने के लिए निम्नलिखित सिद्धान्त आवश्यक है – 

  1. सहायक सामग्री विद्यार्थियों की आवश्यकता के अनुसार होनी चाहिए। 
  2. शिक्षण से सम्बान्धित सामग्री अध्यापक को आसानी से सुलभ होनी चाहिए। 
  3. अध्यापक को समय – समय पर दृश्य – श्रव्य सामग्री के प्रयोगों के परिणामों का मूल्यांकन करते रहना चाहिए। 
  4. सहायक सामग्री का चुनाव सही ढंग से किया जाना चाहिए। 
  5. शिक्षण सामग्री विधार्थियो को पर्याप्त जानकारी देने वाली होनी चाहिए। 
  6. सहायक सामग्री का उपयोग निशिचत उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। 
  7. सहायक सामग्री का प्रयोग साधन के रूप में किया जाना चाहिए, न कि साध्य के रूप में। 
  8. सहायक सामगी के उपयोग के लिए अध्यापेकों को भी उचित रूप से तैयार रहना चाहिए। 
  9. विद्यार्थियों की आयु, उनके अनुभवों तथा योग्यता के अनुसार ही दृश्य – श्रव्य सामग्री का चुनाव किया जाना चाहिए।
  10. सहायक सामग्री द्वारा अध्यापन के कार्य में किसी प्रकार की बधा नहीं आनी चाहिए। 
  11. अध्यापन काल में जो कुध पढ़ाया जाये, यह सामग्री उसके लिए सहायक होनी चाहिए। 
  12. सहायक सामग्री का चयन विषयानुकूल होना चाहिए। 

सारांश यह है कि विद्यार्थियों के पढ़ाने से सम्बान्धित विभिन्न प्रकार की सहायक सामग्री का प्रयोग सोच समझकर किया जाना चाहिए ताकि अध्यापन के परिणाम उचित और संतोषजनक हों। सहायक सामग्री का प्रयोग आवश्यकता नुसार किया जाना चाहिए ताकि अध्यापक अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहे। 

एड़गर के अनुभवों का त्रिकोण 

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