निरीक्षण विधि (Observation Method) का बाल व्यवहार में अध्ययन –

निरीक्षण विधि का बाल व्यवहार में अध्ययन –

हम जानते है अंग्रेजी शब्द के Observation शब्द को निरीक्षण कहा जाता है। जिस का अर्थ होता है निरीक्षण करना या देखना। हम यह भी देखते है इस निरीक्षण में अधिकतर आँखों का प्रयोग किया जाता है। कानों और वाणी का कम।इस विधि के द्वारा प्रत्यक्षत: मिलती है। छोटे बच्चे ना तो प्रश्नों को ठीक से समझ पाते है और न ही उसके उत्तर दे पाते हैं,अतः उनके व्यवहार का अध्ययन करने के लिए निरीक्षणकर्ता बच्चों के समूह में भाग लेता है अथवा दूर खड़ा होकर उनके व्यवहार का अध्ययन करता है। तत्पश्चात् बच्चों के व्यवहार को देखकर वह विश्लेषण द्वारा कुध तथ्यों का पाता लगाता है और उनकी व्याख्या करता है। इस निधि द्वारा बच्चों के सामाजिक विकास, समाज और उनके व्यक्तित्व का सम्बन्ध, उनके नेतृत्व आदि का पता लगाया जाता है। विद्वानों ने निरीक्षण विधि की अलग अलग परिभाषाएं दी हैं –

  1. आँक्सफोर्ड कान्साईज डिक्शनरी के अनुसार – “ अवलोकन का अर्थ है – घटनाओं को, जैसे वे प्रकृति में होती हैं, कार्य तथा कारण से सम्बन्ध की दृष्टि से तथ्य देखना तथा नोट करना है। “
  2. प्रो . गुडे एवं हॉट के अनुसार – “ विज्ञान निरीक्षण से आरम्भ होता है और इसे आन्तिम रूप में प्रमाणीकरण के लिए निरीक्षण पर ही लौट आना पड़ता है। “
  3. साइमन्स का विचार – “ सह्भागिक अवलोकन कोई विधि नहीं है, अपितु कई विधियों तथा तकनीकों का एक संयोग है। “
  4. एं बुल्क ने अक्लोकन विधि के सम्बन्ध में लिखा है – “ वस्तुओँ तथा घटनाओं, उनकी विशेषातों एवं उनके मूर्त सम्बन्धों को समझने और उनके सम्बन्ध में हमारे मानसिक अनुभवों की प्रत्यक्ष चेतना को जानने की क्रिया को अवलोकन कहते हैं। “

उपर्युक्त परिभाषओ के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि निरीक्षण विधि बाल व्यवहार का अध्ययन करने के लिए सर्वाधिक उपयोगी विधि मानी जाती है, क्योंकि इस विधि द्वारा बाल व्यवहार का अध्ययन बड़ी आसानी से किया जाता है। इसमें नेत्रों का अधिक प्रयोग होता है और अध्ययनों से सम्बन्धित प्राथमिक सामग्री एकत्रित की जाती हैै।

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निरीक्षण विधि के निम्नलिखित प्रकार हैं –

  1. सरल अथवा आनेयंत्रित विधि
  2. व्यवस्थित अथवा नियंत्रित निरीक्षण विधि
  3. आयोजित निरीक्षण
  4. सहभागी निरीक्षण
  5. असहभागी निरीक्षण
  6. सामूहिक निरीक्षण विधि।
  1. सरल अथवा अनियंत्रित विधि – इस विधि में निरीक्षक किसी के व्यवहार का अध्ययन उसकी स्वाभाविक पारिस्थिति में तथा उस पर कोई प्रतिरोध लगाए बिना करता है। निरीक्षक का काम व्यवहार का बिना बाधा डाले सिर्फ निरीक्षण करते जाना होता है। इस विधि में व्यवहार के प्रभाव को रोका नहीं जाता। उहाहरण के लिए माना कि निरीक्षक भीड़ के व्यवहार का निरीक्षण करना चाहता है तो इस विधि द्वारा वह उसके व्यवहार को अलग से अर्थात् दूर से देखता है, उसकी वाणी को सुनता है, उसकी क्रियओं, भावों एवं संवेगों  को नोट करता रहता है, पर उससे कुछ पूछना नहीं है। इसे अनियंत्रित विधि इसलिए कहते हैं क्योंकि किसी भी घटना का निरीक्षण प्राकृतिक परिस्थितियों में किया जाता है और उन परिस्थितियों पर कोई दबाव नही डाला जाता ।
  2. व्यवस्थित अथवा नियंत्रित निरीक्षण विधि – इस विधि को व्यवस्थित विधि भी कहते हैं। इसमें निरीक्षक निरीक्षण की योजना पहले से बना लेता है तथा पूर्व नियोजित तथा व्यवस्थित योजना के अनुसार निरीक्षण करता है। इस योजना द्वारा निरीक्षण पर नियंत्रण किया जाता है, जिससे निरीक्षण की त्रुटियों में कमी आती है। यह नियंत्रण दो प्रकार का होता है। एक तो निरीक्षक स्वयं पर नियंत्रण करता है दूसरा निरीक्षित योजना पर नियंत्रण किया जाता है।
  3. आयोजित निरीक्षण – इस निरीक्षण मे निरीक्षण करता एक विशेष वातावरण तैयार करता है किसी विशिष्ट विशेषताओ या घटनाओं को जानने के लिए। इस निरीक्षण में पूर्व नियोजित नियंत्रण रखा जाता है तथा फिर बच्चों का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार के निरीक्षण को या तो आयोजित या नियन्त्रित निरीक्षण कहलाता है। अतः इसमें बच्चों का अध्ययन व्यवस्थित एवं नियंत्रित वातावरण में किया जाता है।
  4. सहभागी निरीक्षण – इस विधि द्वारा निरीक्षण करने वाला व्यक्ति स्वयं उस समूह में सदस्य के रूप में कार्य करता है जिस समूह का उसे निरीक्षण करना होता है। वह समूह की सभी क्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेता है तथा सूक्ष्म रूप में सदस्यों के व्यवहार को नोट कर लेता है, परन्तु जब समूह के सदस्यों को निरीक्षणकर्ता का पाता चला जाता है तो वह अपने वास्तविक व्यवहार को छिपाने की कोशिश करते हैं जिससे निरीक्षणकर्ता निष्पक्ष और क्स्तुगत जानकारी प्राप्त नहीं कर पाता।
  5. असहभागी निरीक्षण – इस निरीक्षण विधि में निरीक्षणकर्ता  विधार्थियों के समूह से बहार रहकर उनके व्यवहार का निरीक्षण करता है इस विधि में निरीक्षण करता है। इस विधि में निरीक्षणकर्ता और समूह के सदस्यों मे पारस्परिक अन्त : क्रिया नहीं हो पाती । इस विधि में निरीक्षणकर्ता और समूह के सदस्यों में पारस्परिक अन्त : क्रिया नहीं हो पाती। इस विधि द्वारा प्राप्त किए गए परिणाम अपेक्षाकृत निष्पक्ष और वस्तुगत होते हैं।
  6. सामूहिक निरीक्षण – इस विधि में नियंत्रित और अनियंत्रित दोनों प्रकार की विधियों का बराबार से प्रयोग किया जाता है। इस विधि द्वारा बालकों की समस्या या किसी घटना का निरीक्षण उनके अनुसंधान कार्यक्ताओं द्वारा किया जाता है जो उस सामाजिक घटना के विशिष्ट पहलुओं के विशेषज्ञ होते हैं।
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निरीक्षण विधि के पग ( चरण )

निरीक्षण विधि को प्रयोग में लाने के लिए चार पग हैं –

  1. तैयारी करना – सबसे पहले निरीक्षण कर्ता को यह निश्चित किया जाना चाहिए की बालक के किस प्रकार के निरीक्षण द्वारा कौन सी आवश्यक जानकरी प्राप्त की जाए। इस के बाद ही निरीक्षण की योजना बनाई जाती है साथ साथ इस कार्य में उपस्थित होने वाली समस्याओं का हल निकालने की तैयारी कर ली जाती है।
  2. व्यवहार का निरीक्षण – इस चरण में यह ध्यान रखा जाता है की विद्यार्थी को यह पता ना चले कि कोई उसका व्यवहार का निरीक्षण कर रहा है इस प्रकार से विधार्थी आपने स्वभाविक रूप में अपाने कर्य को कर सके और निरीक्षणकर्ता  उसके सम्पर्क में आकर उसके स्वाभाविक व्यवहार का पाता लगा सके, और उन्हे लिख सके।
  3. निरीक्षण कार्य का विश्लेषण और व्याख्या – विद्यार्थियों के व्यवहार का निरीक्षण करने के बाद निरीक्षण के समय जो नोट बनाए जाते हैं जिस के आधार पर उचित प्रकार से  विश्लेषण किया जाता है और बच्चे के व्यवहार और व्यक्तित्व के बारे में उचित निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
  4. सामान्यीकरण करना – चौथी अवस्था में मनोवैज्ञानिक विश्लेषित किए गए तथ्यों के आधार पर सर्वमान्य नियम बनाते हैं और यह निष्कर्ष निकालते हैं कि एक विशेष आयु के बच्चे विशेष अवस्था में कैसे एक जैसा व्यवहार करते है।  

 

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