टोली शिक्षा टीम टीचिंग किसे कहते हैं

नमस्कार दोस्तों आप लोग कैसे हैं आज इस लेख में हम सीटेट में पूछे जाने वाले अक्सर सीटेट में इस विषय से प्रश्न पूछ लिया जाता है चलिए हम आज जानेंगे टोली शिक्षा टीम टीचिंग क्या है ? और इसकी जरूरत क्यों पड़ती है आशा है आपको यह सी टेट नोट्स जरूर पसंद आएंगे

टोली शिक्षा टीम टीचिंग किसे कहते हैं 

टोली शिक्षा का अर्थ – शिक्षण की वह विधि जिसके द्वारा दो से अधिक शिक्षक मिलकर छात्रों के समूह को शिक्षण देते हैं और शिक्षण के निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं उसे टोली शिक्षण कहते हैं । 

टोली शब्द का अर्थ है – एक समूह बनाकर शिक्षण करना । अंग्रेजी में इससे (Team Teaching) कहते हैं । इस नवीन शिक्षण प्रणाली का सर्वप्रथम विकास अमेरिका में 1950-60 के मध्य काल में हुआ । 1960 में यह बीपी इंग्लैंड पहुंची । वहां जे .फ्री . मैने ने इसे विकसित किया । सर्वप्रथम हावर्ड विश्वविद्यालय ने 1955 में इस विधि का प्रयोग किया परंतु बाद में शिकागो विश्वविद्यालय में फ्रांसिस चेंज ने इस विधि का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है । द्वितीय विश्वयुद्ध में सेना के प्रशिक्षण के लिए इस विधि का सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया । विद्वानों ने टोली शिक्षण की अलग-अलग परिभाषाएं दी है – 

परिभाषा – 

  1. डेविड बार्थिक के अनुसार –टोली शिक्षा ऐसी व्यवस्था है जिसमें कई अध्यापक अपने विद्यार्थियों की आवश्यकताओं एवं विद्यालय में उपलब्ध योग्यताओं के अनुरूप एक उचित कार्य योजना बनाने तथा उसे क्रियान्वित करने के लिए संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग करते हैं । ” Team teaching is a form of organization in which individual teachers decide to post resources, interact and expertise in order to device and implement a scheme of work suitable to needs of their pupils and the facilities to their school.”) 
  2. कालो ऑलसन के अनुसारटोली शिक्षण अनुदेशन परिस्थितियों को उत्पन्न करने की एक पद्धति है जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक अपने कौशल तथा शिक्षण योजना का एक कक्षा शिक्षण में एक साथ सहयोग करते हैं । इसी योजना लचीली होती है जिससे कक्षा शिक्षण की आवश्यकता अनुसार बदल दिया जाता है । ( ” Team teaching is an instructional situation where two or more teachers processing complete entry teaching skill co-operatively plan and implement the instruction for a single group of students using flexible scheduling and grouping teaching gues to meet the particular instruction.”) 

एक अन्य परिभाषा के अनुसार – ” टोली शिक्षण एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक शिक्षण सहायक सामग्री तथा बिना इसके सहकारी योजना अनुदेशन तथा मूल्यांकन के लिए एक या अधिक कक्षाओं के लिए तैयार करना है । इसके अंतर्गत शिक्षकों की विशिष्ट समानता ओं का निर्धारित समय में अधिकतम लाभ उठाया जाता है ।” 

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि टोली शिक्षक शिक्षण की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक सम्मिलित होकर अनुदेशन का कार्य करते हैं और अपने साधना, योग्यताओं, अनुभवों तथा कौशलों को एक साथ जुट आते हैं । इसे सहकारी शिक्षण भी कह सकते हैं । 

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टोली शिक्षण के उद्देश्य – टोली शिक्षण के निम्नलिखित उद्देश्य है – 

  1. टोली शिक्षण द्वारा शिक्षण के उपलब्ध साधनों का उचित प्रयोग किया जाता है और शिक्षण स्तर में सुधार लाने का प्रयास किया जाता है ।  
  2. टोली शिक्षण द्वारा शिक्षकों में सहयोग और दायित्व की भावना विकसित की जाती है क्योंकि जब शिक्षक मिलजुलकर शिक्षण कार्य करेंगे तो निश्चय ही वे एक दूसरे की सहायता करेंगे और उन में सहयोग की भावना का विकास होगा । 
  3. इस शिक्षण प्रणाली द्वारा शिक्षकों की विशेष योग्यता तथा सूचियों का सर्वोत्तम प्रयोग करके शिक्षण को प्रभावशाली बनाया जा सकता है । 
  4. टोली शिक्षण का मुख्य उद्देश्य है – अनुदेशन प्रक्रिया में सुधार लाना और उसके द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार में परिवर्तन लाना । 
  5. टोली शिक्षण में दो या दो से अधिक शिक्षक मिलजुलकर शिक्षण कार्य करते हैं इसलिए इसमें कम से कम त्रुटियां होती है क्योंकि एक अध्यापक की दूसरे अध्यापक की त्रुटियों को पहचान सकता है, सामान्य विद्यार्थी नहीं ।

टोली शिक्षण की क्रिया विधि – टोली शिक्षण की क्रिया सोपानों तीन में पूरी होती है ।

  1. टोली शिक्षण की योजना – टोली शिक्षण के इस प्रथम सोपान में निम्नलिखित क्रियाएं सम्मिलित की जाती है – 
  • टोली शिक्षण के उद्देश्यों का प्रतिपादन करना । 
  • उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप में लिखना । 
  • विद्यार्थियों के पूर्व व्यवहारों ( Entering behaviour) को जानना । 
  • शिक्षण के प्रकरण (Topic) के बाद में निर्णय लेना । 
  • अनुदेशन का स्तरीकरण करना । 
  • शिक्षण के लिए संभावित रूपरेखा तैयार करना । 
  • शिक्षण संसाधनों की अधिगम वातावरण उत्पन्न करने के लिए एक सुनिश्चित योजना तैयार करना । 
  • अध्यापकों को उनकी रूचि हो तथा कौशलों को ध्यान में रखकर उन्हें उत्तरदायित्व सौंपना । 
  • मूल्यांकन संबंधी विभिन्न प्रविधियो का उचित चयन करना । 
  1. टोली शिक्षण की व्यवस्था – 
  • शुरू में कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं जिसमें विद्यार्थियों को भूमिकाओं का बोध होता है इन्हीं भूमिकाओं के अनुसार अनुदेशन का स्तरीकरण किया जाता है । 
  • इसके अंतर्गत उचित संप्रेक्षण प्रविधि का चयन किया जाता है । 
  • किसी योग्य शिक्षक द्वारा नेतृत्व प्रवचन प्रस्तुत किया जाता है । 
  • अन्य टोली के शिक्षकों द्वारा नेतृत्व प्रवचन के बाद उन तत्वों का स्पष्टीकरण किया जाता है । 
  • इन क्रियाओं से विद्यार्थियों को पुनर्बलन मिलता है । 
  • नेतृत्व प्रवचन में विद्यार्थियों को कुछ गृह कार्य कक्षा में ही करने को दिए जाते हैं तथा कुछ अनुकरण काल में प्रदान किए जाते हैं यह टोली शिक्षण का महत्वपूर्ण कार्य है । 
  1. टोली शिक्षण के परिणामों का मूल्यांकन – 
  • टोली शिक्षण के तृतीय सोपान में निम्नलिखित क्रियाएं सम्मिलित है । 

इस सोपान में विभिन्न विधियों द्वारा मूल्यांकन किया जाता है तथा विशेषज्ञों द्वारा प्रश्न पूछे जाते हैं । 

  • विद्यार्थियों की कमजोरियों तथा कठिनाइयों का निदान किया जाता है । 
  • मूल्यांकन के आधार पर टोली शिक्षण प्रक्रिया में आवश्यक सुधार किया जाता है । 
  1. टोली शिक्षण के लाभ महत्व गुण – 
  • विशेषज्ञों के सहयोग की प्राप्ति – टोली शिक्षण का प्रमुख लाभ यह है कि विद्यार्थियों को विशेषज्ञों के सुझाव प्राप्त हो जाते हैं । 
  • गुणात्मक सुधार – टोली शिक्षण में विद्यार्थियों में गुणात्मक सुधार लाया जा सकता है । 
  • इसमें शिक्षकों के समय तथा शक्ति का उचित प्रयोग किया जाता है तथा समय की बर्बादी नहीं होती । 
  • शिक्षकों के व्यवहार में सुधार – टोली शिक्षण से शिक्षकों के व्यवहार में भी परिवर्तन आता है और वे विद्यार्थियों के प्रति अपने दायित्व को समझने लगते हैं । 
  • लचीली शिक्षण प्रक्रिया – टोली शिक्षण का प्रमुख लाभ यह है कि यह एक लचीली शिक्षण प्रक्रिया है और इससे आवश्यकता अनुसार परिवर्तन किया जा सकता है । 
  • कम खर्चीली – टोली शिक्षण में अधिक खर्च नहीं होता, साथ ही साथ और शक्ति भी बचती है । 
  • तकनीकी में सुधार – टोली शिक्षण में कुछ अध्यापक मिलजुल कर शिक्षण की योजना बनाते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर आपसी सहमति से शैक्षिक तकनीक में सुधार कर सकते हैं । 
  • दृश्य श्रव्य साधनों का उचित प्रयोग – इस शिक्षण तकनीक मैं दृश्य श्रव्य साधनों तथा भौतिक साधनों का उचित प्रयोग किया जा सकता है । 
  • शिक्षक की रूचि का ध्यान – इस शिक्षण प्रणाली में टीम का प्रत्येक अध्यापक अपनी रूचि वह योग्यता के अनुसार टीम शिक्षण में योगदान देता है । आवश्यकता पड़ने पर वह अपने मौलिक विचार भी दे सकता है । 
  • विद्यार्थियों की सहभागिता – इस शिक्षण से शिक्षकों के साथ-साथ विद्यार्थियों में सहभागिता की वृद्धि होती है और कक्षा का वातावरण शिक्षा के अनुकूल बन जाता है । 
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हानियां (सीमाएं) – टोली शिक्षण प्रणाली की कुछ अपनी सीमाएं तथा हानियां है जिनका विवरण इस प्रकार है – 

  1. शिक्षकों के दायित्व में वृद्धि – टोली शिक्षण में शिक्षकों की भूमिकाओं में विविधता रहती है अतः उनका दायित्व बढ़ जाता है । 
  2. संतुलन का अभाव – शिक्षकों में संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है । 
  3. पर्याप्त साधनों का अभाव – टोली शिक्षण में शिक्षण संस्थाओं के पास ना पर्याप्त साधन होते हैं नाम बड़े कमरे होते हैं । विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में स्कूलों में यह प्रणाली लागू नहीं की जा सकती । 
  4. संतुलन की कमी – अक्सर देखने में आया है कि टीम के सदस्यों में संतुलन स्थापित नहीं हो पाता । उनमें दायित्व की कमी होती है और वे अपने दायित्व का बोध दूसरे शिक्षकों पर डाल देते हैं । 
  5. महंगी प्रणाली – यह प्रणाली काफी महंगी है इस प्रणाली को सफल बनाने के लिए काफी धन खर्च करना पड़ता है और हमारे विद्यालयों के पास पर्याप्त साधन नहीं होते । 
  6. वर्गीकरण की समस्या – टोली शिक्षण में दायित्व वर्गीकरण की एक बहुत बड़ी समस्या है यह निर्णय करना बड़ा कठिन होता है कि किस शिक्षक को क्या दायित्व सौंपा जाए और क्यों सौंपा जाए । 
  7. अध्यापकों के चयन की समस्या – टोली शिक्षण के लिए अध्यापकों की टीम का गठन करना बड़ा कठिन कार्य है क्योंकि सभी अध्यापक इस कार्य के लिए प्रशिक्षित नहीं होते । 
  8. अनेकता में एकता की स्थापना – टोली शिक्षण विधि में अनेकता होती है जिसमें एकता स्थापित करना बहुत बड़ी समस्या है कभी-कभी टीम के सदस्यों के विचार आपस में मिलते ही नहीं । 
  9. अध्यापकों का नकारात्मक दृष्टिकोण – टोली शिक्षण प्रणाली को अपनाना बहुत कठिन है कारण यह है कि अधिकांश शिक्षक परंपरागत प्रणाली को ही पसंद करते हैं और वह परिवर्तन का विरोध करते हैं ।
  10. अनुसाधन कार्य की कमी – टोली शिक्षण में अनुसाधन कार्य की बहुत बड़ी कमी है और अनुसाधन के बिना किसी शिक्षण प्रणाली में पूर्णता नहीं आ सकती । 
  11. लचीलापन का अभाव – प्राया देखने में आया है कि टोली शिक्षण में लचीलापन नहीं होता । अध्यापकों का समूह परस्पर मिलकर जिन सिद्धांतों का निर्माण कर लेते हैं उन्हीं के द्वारा विद्यार्थियों को शिक्षण दिया जाता है । 
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संक्षेप में हम कह सकते हैं कि टोली शिक्षण में कुछ गुण है तो कुछ दोस्त भी है फिर भी इस विधि को ईमानदारी के साथ लागू किया जाए तथा योग्य शिक्षकों की टीम बनाई जाए तो यह शिक्षण निश्चित रूप से सफल हो सकता है । 

सारांश

आशा है आपको यह लेख जरूर पसंद आया होगा इस लेख को ध्यान पूर्वक पढ़ लीजिएगा क्योंकि सीटेट में इस विषय से काफी प्रश्न पूछे जाते हैं और b.Ed एंट्रेंस एग्जाम में भी इससे काफी प्रश्न पूछे जाते हैं टीम टीचिंग किसे कहते हैं या दल टीचिंग भी इसे कहा जाता है । धन्यवाद!

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रोशन AllGovtJobsIndia.in मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं,रोशन को लेखन के क्षेत्र में 5 वर्षों से अधिक का अनुभव है। औरAllGovtJobsIndia.in की संपादक, लेखक और ग्राफिक डिजाइनर की टीम का नेतृत्व करते हैं। अधिक जानने के लिए यहां क्लिक करें। About Us अगर आप इस वेबसाइट पर लिखना चाहते हैं तो हमें संपर्क करें,और लिखकर पैसे कमाए,नीचे दिए गए व्हाट्सएप पर संपर्क करें-

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