पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत ( Piaget’s Cognitive Development Theory )

जैसाकि हमने पिछले अध्यायो में पढ़ा है कि मानव विकास की वृद्धि और विकास के कई आयाम होते है और भिन्न – भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने इस आयामों को विकास की अवऔओ। के संदर्भ में सिद्धांतों के रूप में प्रतिपादित किया है। इन सिद्धांतो में जीन पियाजे, लाँरेस कोहलबर्ग एवं व्यगेटास्की के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतो का विशेष महत्व है ।

डॉ. जीन पियाजे ( 1896 – 1980 ) एक स्विस मनोवैज्ञक्षिक थे और मूल रूप से एक प्राणी विज्ञान के विद्वान थे । उनके कार्यो ने उन्हें एक मनो वैज्ञानिक के रूप मे प्रसिद्धि दिलवाई थी । पियाजे ने फ्रांस के बिनेट (Binet) के साथ मिलकर भी कई वर्षों तक कार्य किए । पियाजे ने बुद्धि के विषय में अपना र्तक दिया कि बुद्धि जन्मजात नही होती है । इन्होंने इस पूर्व में प्रचलित कारक का कि बुद्धि जन्मजात हाोती है, का खण्डन किया । जैसे जैसे बालक की आयु बढ़ती है वैसे वैसे उसका कार्य – क्षेत्र भी बढ़ता है और बुद्धि का विकास भी संभव होता है। प्रारंभ में बच्चा केवल सरल सम्पत्ययों को ही सीखता है और जैसे – जैसे उसका अनुभव बढ़ता है बुद्धि का विकास होता है, आयु बढ़ती है , वैसे – वैसे वह जटिल सम्मत्ययों को भी सीखता है ।

वातावरण एवं क्रियाओं का योगदान सीखने या अधिगम में महत्वपूर्ण होता है । पियाजे यह भी कहते हैँ कि सीखना कोई यांत्रिक क्रिया नही है, बाल्कि यह एक बौद्धिक प्रक्रिया होती है । सीखना एक संपत्यय निर्माण करना होता है और निर्माण करने की यह प्रक्रिया सरल से कठिन की ओर चलती है । पहले जब बालक का अनुभव होता है , उसकी आयु भी कम होती है , तो वह सरल अवधारणाओं या सम्पत्ययों को ही सीख सकते हैं और जैसे – जैसे बालक की आयु बढ़ती है , तो उसका अनुभव भी बढ़ता है और वह अपनी बुद्धि से जटिल सम्पत्यों का निर्माण करता है ।

बालक की सत्य के बारे में चिन्तन करने की शकित, परिपक्वता – स्तर और अनुभवों की अन्तः किया पर निर्भर करती है तथा निर्धारित होता है। इसीलिए मनोवैज्ञानिक ने इसे अन्तः क्रियावदी विचारधारा का नाम दिया है , और कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसे सम्प्रत्यय निर्माण का सिद्धांत भी कहा है।

संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत के पद ( पियाजे )
( Steps of Cognitive Development Theory )

अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में पियाजे दो पदों का उपयोग करते है । संगठन और अनुकूलन हालांकि इन पदों के अलावा भी पियाजे ने कुध अन्य पदों का प्रयोग अपने संज्ञानात्मक विकास मे किया है।

(1) अनुकूलन ( Adaptation ) : पियाजे के अनुसार बच्चों में अपने वातावरण के साथ समायोजन की प्रवृति जन्मजात होती है I बच्चे की इस प्रवृति को अनुकूलन कहा जाता है । पियाजे के अनुसार बालक आने प्रारभिंक जीवन से ही अनुकूलन करने लगता है । जब को बच्चा वातावरण में किसी उद्दीपक परिस्थितियो के समाने होता है । उस समय उसकी विभिन्न मानसिक क्रियाए अलग – अलग कार्य न करके एक साथ संगंठित होकर कर्या करती है , और ज्ञान अर्जित करती है । यही क्रिया हमेशा मानसिक – स्तर पर चलती है। वातावरण के साथ मनुष्य का जो संबंध होता है उस संबंध को संगठन आन्तरिक रूप से प्रभावित करता है जबकि अनुकूलन बाहरी रूप से ।पियाजे ने अनुकूलन की प्रक्रिया को अधिक महत्वपूर्ण मना है ।

पियाजे ने अनुकूलन की सम्पूर्ण प्रक्रिया को दो उप -पकियोओं में बॉटा है।

(i) आत्मसात्करण ( Assimilations )
(ii) समंजन ( Accommodation )

(1) आत्मसात्करण एक ऐसी पक्रिया है जिसमें बालक किसी समस्या का समाधान करने के लिए पहले सीखी हुई योजनाओं या मानसिक प्रक्रिमाओं का सहारा लेता है । यह एक जीव – वैज्ञानिक प्रक्रिया है । आत्मसात्करण को हम इस उदाहरण के माध्यम से भी समझ सकते हैं कि जब हम भोजन करते हैँ तो मूलरूप से भोजन हमारे भीतर नहीं रह पाता है बल्कि भोजन से बना हुआ रक्त हमारी मांसपेशियों मे इस प्रकार समा जाता है कि जिससे हमारी मांसपेशियों की संरचना का आकार बदल जाता है । इससे यह बात स्पष्ट होती है कि आत्मसात्करण की प्रक्रिया से संरचनात्मक परिर्वतन होते हैं ।

पियाजे के शब्दों में ” नए अनुभव का आत्मसात्करण करने के लिए अनुभव के स्वरूप में परिवर्तन लना पड़ता है । जिससे वह पुराने अनुभव के साथ मिलजुलकर संज्ञान के एक नए ढांचे को पैदा करना पड़ता है । इससे बालक के नए अनुभवों में परिर्वतन होते है ।

(2) संमजन एक ऐसी प्रक्रिया है जो पूर्व में सीखी योजना या मानासिक प्रक्रियाओं से काम न चलने पर समंजन के लिए ही की जाती है । पियाजे कहते हैं कि बालक आत्मसात्करण और सामंजस्य की प्रक्रियाओ के बीच संतुलन कायम करता है । जब बच्चे के सामने कोई नई समस्या होती है , तो उसमें सांज्ञानात्मक असंतुलन उत्पन्न होता है और उस असंतुलन को दूर करने के लिए वह आत्मसात्करण या समंजन या दोनों प्रक्रियाओं को प्रारंभ करता है ।

समंजन को आत्मसात्करण की एक पूरक प्रकिया माना जाता है । बालक अपने वातावरण या परिवेश के साथ समायोजित होने के लिए आत्मसात् करण और समंजन का सहरा आवश्यकतानुसार लेते हैं ।

संज्ञानात्मक संरचना ( Cognitiive structure ) : पियाजे के अनुसार संज्ञानात्मक संरचना से तात्पर्य बालक का मानसिक संगठन से है । अर्थात् बुद्धि में संलिप्त विभिन्न क्रियाएं जैसे – प्रत्यक्षीकरण स्मृति, चिन्तन तथा तर्क इत्यादि ये सभी संगठित होकर कार्य करते हैं । वातावरण के साथ सर्मयाजन , संगठन का ही परिणाम है ।

मानसिक संक्रिया ( Mental operation ): बालक द्वारा समस्या – समाधान के लिए किए जाने वाले चिन्तन को ही मानसिक संक्रिया कहते हैं ।

स्कीम्स ( Schemes ) : यह बालक द्वारा समस्या – समाधान के लिए किए गए चिन्तन का आभिव्यकत रूप होता । अर्थात् मानसिक संक्रियाओं का अभिव्यक्त रूप ही स्कीम्स होता है ।

स्कीमा ( Schema ) : एक ऐसी मानसिक संरचना जिसका सामान्यीकरण किया जा सके, स्कीमा होता है ।

संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ ( Stage of Cognitiive Development )

पियाजे के अनुसार जैसे जैसे संज्ञानात्मक विकास बढ़ता है, वैसे – वैसे अवस्थाएं भी परिवर्तित होती रहती है । किसी विशेष अवस्था में बालक के समस्त ज्ञान – विचारों व्यवहारों के संगठन से एक सेट ( Set ) यानि समुच्चय तैयार होता है , जिसे पियाजे स्कीमा काता है । इन स्कीमाओं का विकास बालक के अनुभव व परिपक्वता पर निर्भर करता है । बालक के संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाए होती हैं ।
संवेदी पेशीय अवस्था या इन्दिय गतिक अवस्था ( Sensori motor stage )
पूर्व संक्रिया अवस्था ( Pre – operational stage )
मूर्त संक्रिया अवस्था ( Concrete operational stage )
औपचारिक संक्रिया अवस्था ( Stage of Formal operation )
(1) संवेदी पेशीय अवस्था या इन्द्रिय गतिक अवस्था ( Sensori Motor Stage ) : यह संज्ञानात्मक विकास की प्रथम अवस्था होती है। यह अवस्था जन्म से लेकर 2 वर्ष की अवस्था तक चलती है । जन्म के समय बालक केवल सरल क्रियाएं ही करता है । बच्चा इस अवस्था में ज्ञानेन्दियो की सहायता से वस्तुओ, ध्वनियों , रसों व गंध आदि का अनुभव करता है । इस सरल क्रियाओ को ही पियाजे सहज स्कीमा कहते है । इन्ही अनुभूतियों की पुनरावृति के कारण बच्चा संज्ञानात्मक आत्म सात् न व समंजन की प्रक्रियाएं शुरू करता है । जब उसे परिवेश में उपस्थित उददीपकों को पाता चलता है , तो बच्चा अपनी इन्द्रियों द्वारा इनका प्राथमिक अनुभव करता है । पियाजे ने अपनी इस अवस्था को छः उप – अवस्थाओ में विभाजित करता है ।

(2) पूर्व – संक्रिय अवस्था ( Pre Operation Stage ): पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की द्वितीय अवस्था पूर्व – संक्रिय अवस्था है, जिसे वह बच्चे की 2 वर्ष से 7 वर्ष की अवस्था तक मानता है । इस अवस्था को वह 2 उप – अवस्थाओं में विभाजित करता है । इस अवस्था में बच्चे में निम्न प्रकार की विशेषताएं पाई जाती हैं :
(a) बच्चा आने आस – पास की वस्तुओं और प्राणियों व शब्दों में संबंध स्थापित करना सीख जाते हैं ।
(b) बच्चे प्रायः खेल व अनुकरण द्वारा सीखते है ।
(C) पियाजे कहते हैं कि इस अवस्था में 4 वर्ष तक के (e) बच्चे निर्जीव क्स्तुओं को सजीव वस्तुओँ के रूप में समझते हैं।
(e) बच्चे आने विचार को सही मानते है ।बच्चे समझते हैँ कि सारी दुनिया उन्हीं के इर्द र्गिद है । इसे पियाजे के आत्मकेनिद्रकता ( Ego centerism ) का नाम दिया है ।
(f) बच्चे भाषा सीखने लगते हैं ।
(g) बच्चे चिन्तान करना भी शुरू कर देते हैं ।
(h) छः वर्ष तक आते – आते बच्चा मूति – प्रत्ययों के साथ अमूर्त प्रत्ययों का भी निर्माण करने लगते हैं ।
(i) वे रटना शुरू करते है । अर्थात् वे ग्टकर सीखते हैं न कि समझकार ।
(j) बच्चा स्वार्थी नहीं होता है ( इस अवस्था में )
(k) धीरे – धीरे वह प्रतीकों को ग्रहण करना सीखता है ।
(I) इस अक्स्था में बालक कार्य और कारण के संबंध से अनजान होते हैं ।
(m) मानासिक रूप से अभी अपरिपक्व होने के कारण वे समस्या – समाधन के दौरान समस्या के केवल एक ही पक्ष को जान पाते हैं ।

(3) मूर्तसंक्रिया अक्स्था ( Concerte Operation Stage ) : इस अवस्था की विशेषताओं का वर्णन पियाजे के अनुसार निम्न प्रकार से किया गया है ।
(a) यह अवस्था 7 वर्ष से 11 वर्ष की अवस्था तक चलती है अथवा मानी जाती है ।
(b)अधिक व्यवहारिक व यथार्थवादी होते हैं । ( इस अवस्था में बालक )
(c) र्तकशक्ति की क्षमता का विकास होना प्रारभ हो जाता है ।
(d) अमूति समस्याओं का समाधान वे अभी भी ढूंढ़ पाते हैँ ।
(e) इस अवस्था में बच्चे क्स्तुओं को उनके गुणों के आधार पर पहचाना शुरू कर देते हैं ।
(f) चिन्तन में क्रमबद्धता का अभाव अभी भी होता हैं ।
(g) इस अवस्था में बालकों में कुछ क्षमताएं विकासित हो जाती हैं। जैसे – कंजर्वेशन अर्थात् जब कोई ज्ञान जो पदार्थ रूप मे बदल जाने के बाद भी मात्रा संख्या, भार और आयतन की द्वाष्टि से समान रह जाता है, उसे कंजर्वेशन कहते हैं ।
(h) संख्या बोध अर्थात् गणित को जानना व वस्तुओं को निनना शुरू कर देते हैं ।
(¡) इसके अलावा क्रमानुसार व्यवस्था , वर्गीकसण करना और पारस्परिक संबंधों आदि को जानने लगते हैं ।
(4) औपचारिक संक्रिया की आस्था ( Stage of Formal Operational ) : पियाजे के अनुसार, संज्ञानात्मक विकास की चतुर्थ व आन्तिम अक्स्था की विशेषताएं निम्न प्रकार है :
(a) बच्चा विसंगतियों को समझने की क्षमता रखता है ।
(b) बच्चे में वास्तविक अनुभवो को काल्पनिक रूप या परिस्थतियों में प्रक्षेपित करने की क्षमता आ जाती है ।
(c) बच्चा घटनाओं की परिकल्पाएं बनाने लगता है और इन्हें सत्यापित करने का भी प्रयास करता है ।
(d) बच्चा इस अवस्था में विचारोँ को संगठित करना और वगीकृत करना सीख जाता है ।
(e) बच्चे प्रतीको का अर्थ भी समझना शुरू कर देते हैं ।
(f) यह अवस्था 12 वर्ष से वयस्क होने तक चलती है ।
(g) यह अवस्था संज्ञानात्मक विकास की आन्तमि अवस्था होती है ।
(h) आयु बढ़ने के साथ – साथ बच्चों के अनुभव बढ़ने से (i) उनमें समस्या के समाधान की क्षमता भी विकसित होती हैँ ।
(j) उनके चिन्तन में क्रमबद्धता आने लगती है ।
इस अवस्था में बच्चे का मस्तिष्क परिपक्व होने लगता है ।
पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत की शिक्षा में उपयोगिता ( Educational Implication of Piaget’s Cognitive Development )
(1) पियाजे ने आने सिद्धांत का प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में करते हुए अनुकरण व खेल की क्रिया को महत्व दिया है । शिक्षकों को अनुकरण व खेल विधि से शिक्षण – कार्य करना चाहिए ।
(2) पियाजे कहते हैँ कि जो बच्चे सीखने में धीमे होते हैं उन्हें दण्ड नहीं देना चाहिए ।
(3) पियाजे के सिद्धांत के अनुसार आभिप्रेरणा और बालक दोनों ही अधिगम व विकास के लिए आवश्यक है । इन दोनों को शिक्षा में प्रयोग करना उचित होगा ।
(4) बच्चों को अपने आप करके सीखने का अवसर हमे प्रदान करना चाहिए ।
(5) 12 वर्ष की अवस्था के बच्चों को समस्या समाधान विधि से पढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि 10 -12 वर्ष की आयु तक आते – आते बच्चों में यह क्षमता विकसित होने लगती है ।
(6) शिक्षकों व अन्य व्यकितयों को बच्चों की बुद्धि का मापन उसकी व्यवहारिक क्रियाओ के आयोग के आधार पर करना चाहिए ।
(7) बच्चा स्वयं और पर्यावरण से अंतः क्रिया द्वारा सीखता है । अतः हमें ( शिक्षको, माता – पिता ) बच्चे के लिए प्रेरणादायक माहौल का निर्माण कसना चाहिए ।
(8) इस सिद्धांत के आधार पर शिक्षक एवं अभिभावक बच्चों की र्तकशकित व विचारशक्ति को पहचान सकते हैं ।

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