भारत की जलवायु -Climate of India Geography IAS Study Notes Download in PDF-By: Raj Holkar

प्रिय पाठको, ऑल गवर्नमेंट जॉब इंडिया आपके लिए महत्वपूर्ण भूगोल विषय से भारत की जलवायु पर स्टडी नोट्स ले कर आए हैं जिस के Educator – Raj Holkar है। उन्होंने इस  विषय पर बहुत ही सरल शब्दों में  विषय एक एक बिंदु को प्रस्तुत किया है, आप इस नोट्स के द्वारा  UPSC, IAS, MPPSC & Other State PSC’s की परीक्षा की सफलता हेतु उत्तम पाएंगे।

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भारत की जलवायु 

 जलवायुः किसी स्थान अथवा देश में लम्बे समय के तापमान, वर्षा, वायुमण्डलीय दबाव तथा पवनों की दिशा व वेग का अध्ययन व विश्लेषण जलावयु कहलाता है। सम्पूर्ण भारत को जलवायु की द्वाष्टि से उष्ण कटिबंधीय मानसूनी जलवायु वाला देश माना जाता है।

भारत में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु पायी जाती है। मानसून शब्द की उत्पति अरबी भाषा के ‘ मौसिम’ शब्द से हुई है।

मौसिम शब्द का अर्थ : पवनों की दिशा का मौसम के अनुसार उल्ट जाना होता है। भारत में अरब सगार एवं बंगाल की खाडी से चलने वाली हवाओं की दिशा में ऋतुत् परिवर्तन हो जाता है, इसी संदर्भ में भारतीय जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है।

भारतीय जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकः

¡) स्थिति एवं अक्षांशीय विस्तारः – भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है एवं कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य से होकर गुजरती है अतः यहाँ का तापमान उच्च रहता है। ये भारत को उष्णकाटिबंधीय जलवायु वाला क्षेत्र बनाती है।

ii) समुद्र से दूरी : भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है भारत के पीश्चमी तट, पूर्वी तट एवं दक्षिण भारतीय क्षेत्र पर समुद्रीय जलवायु का प्रभाव पड़ता है किन्तु उत्तरी भारत, उत्तरी पश्चिमी भारत एवं उत्तरी –  पूर्वी भारत पर  समुंद्री जलवायु का प्रभाव नगण्य है।

iii) उत्तरी पर्वतीय श्रेणिया : हिमालयी क्षेत्र भारत की जलवायु को प्रभावित करता है यह मानसून की अवधि में भारतीय क्षेत्र में वर्षा का कारण भी बनता है तथा शीत ऋतु में तिब्बतीय क्षेत्र से आने वाली अत्यंत शीत लहरों में रुकावट पैदा कर भारत को शीत लहर के प्रभावों से बचाने के लिए आवरण या दीवार की भूमिका निभाता है।

iv) भू – आकृति: – भारत की भू- आकृतिक संरचना पहाड़, पठार, मैदान एवं रेगिस्तान भी भारत की जलवायु को प्रभावित करते हैं। अरावली पर्वत माला का  पश्चिमी भाग एवं  पश्चिमी घाट का  पूर्वी भाग आदि वर्षा की कम मात्रा प्राप्त करने वाले क्षेत्र हैं।

V) मानसूनी हवाएं : मानसूनी हवाएं भी भारतीय जलवायु को प्रभावित करती है हवाओं में आर्द्रता की मात्रा, हवाओं की दिशा एवं गति आदि।

VI) अर्ध्व वायु संचरण ( जेट स्ट्रीम ) : जेट स्ट्रीम ऊपरी शोभमणल में आम तौर पर मध्य अक्षांश में भूमि से 12 Km ऊपर  पश्चिम से पूर्व तीव्र गति से चलने वाली एक धारा का नाम है। इसकी गीत सामान्यत 150 – 300 Kmp  की होती है।

Vii) ऊष्ण कटिबंधीय चक्रवात और पशिचम विक्षोभ  :- उष्ण  कटिबंधीय चक्रवात का निर्माण बंगाल की खाड़ी और अरब सगर में होता है। और यह प्रायद्वीपीय भारत के एक बड़े भू भाग को प्रभावित करता है।

Vii) दक्षिणी दोलन : – जब कभी भी हिन्द भी हिन्द महासागर के ऊपरी दवाब अधिक हो जाता है, तब प्रशांत महासागर के ऊपर निम्न दबाव बनता है। और जब प्रशांत महासागर के ऊपर उच्च दबाव की  सृष्टि होती है तब हिन्द महासागर के ऊपर निम्न दबाव बनता है। दोनों महासागरों के इस उच्च एव निम्न वायु दाबीय अन्तः सम्बन्ध को ही दक्षिणी दोलन कहते हैं।

ix-एल निनो  : इसके प्रभाव के कारण भारत में कम वर्षा होती है।

x- ला – नीना : यह एल – नीनों की विपरीत संकल्पना है। इसके प्रभाव में भारत में वर्षा की मात्रा अच्छी रहती है।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण : कोपेन ने भारतीय जलवायुवीय प्रदेशों को 9 भागों में विभाजित किया है –

  1. लघु कालीन शीत ऋतु सहित मानसूनी जलवायु (AMW प्रकार) : – ऐसी  जलवायु मुम्बई के दक्षिण में पशिचमी तटीय क्षेत्रों में पायी जाती है। इन क्षेत्रों में दक्षिण –  पश्चिम मानसून से ग्रीष्म ऋतु में 250 – 300 cm से अधिक वर्षा होती है। इस जलवायु प्रदेश में आने वाले क्षेत्र –

– मालावार, एवं कोंकण तट, गोवा के दक्षिण तथा पशिचमी घाट पर्वत की पशिचमी ढाल।

– उत्तर  पूर्वी भारत

– अंडमान – निकोबार द्वीप समूह

  1. उष्ण कतिबंधीय सवाना जलवायु प्रदेश ( AW प्रकार ) : – यह जलवायु कोरोमण्डल एवं मालावार तटीय क्षेत्रों के अलावा प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश भागों में पायी जाती है। इस जलवायु क्षेत्र की ऊपरी सीमा लगभग कर्क रेखा से मिलती है अर्थात् यह जलवायु कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित प्रायद्वीपीय भारत के अधिकांश भगों में पायी जाती है। यहाँ सलाना हर प्रकार की वनस्पति पायी जाती है। इस प्रकार के प्रदेश में ग्रीष्मकाल मे दक्षिण – पशिचम मानसून से लगभग 75 Cm  वर्षा होती है। शीत काल सूखा रहता है।

3.शुष्क ग्रीष्म ऋतु, आर्द्र शीत ऋतु सहित मानसूनी जलवायु ( AS प्रकार) : यह वह प्रदेश है जहाँ शीतकाल में वर्षा होती है और ग्रीष्म ऋतु सूखा रहता है। यहाँ शीत ऋतु में उत्तर –  पूर्वी मानसून ( लौटते हुए मानसून)  से अधिकांश वर्षा होती है। वर्षा ऋतु की मात्रा शीत काल मे लगभग 75-100 तक होती है। इसके अन्तर्गत तटीय तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश के सीमावर्ती प्रदेश आते हैं।

4.अर्द्ध शुष्क स्टेपी जलवायु ( Bshw प्रकार) : यहाँ वर्षा ग्रीष्मकाल में 30 – 60 cm होती है। शीत काल में वर्षा का अभाव रहता है। यहाँ स्टेपी प्रकार की वनस्पति पायी जाती हैं। इसके अन्तर्गत – मध्यवर्ती राजस्थान, परिचमी पंजाब, हरियाणा, गुजरात के  सीमावर्ती क्षेत्र एवं  पश्चिमी घाट का वृष्टि छाया प्रदेश। शामिल हैँ।

  1. उष्ण मरूस्थलीय जलवायु (Bwhw): यहाँ वर्षा काफी कम होती है ( 30 cm से भी कम ), तापमान अधिक रहता है। यहाँ प्राकृतिक वनस्पति कम ( नगण्य ) होती हैं एवं कांटेदार मरूस्थलयी वनस्पति पायी जाती है इस प्रदेश के अंर्तगत – राजस्थान का पशिचमी क्षेत्र, उत्तरी गुजरात, एवं हरियाणा का दक्षिणी भाग शामिल हैं।
  2. शुष्क शीत ऋतु की मानसूनी जलवायु (cwg प्रकार) : इस प्रकार की जलवायु गंगा के अधिकांश मैदानी इलाकों, पूर्वी राजस्थान, असम और मालवा के पठारी भागों में पायी जाती है। यहाँ गर्मी में तापमान 40 ℃ तक बढ़ जाता है जो शीतकाल में 27 ℃ तक पहुंच जाता है। वर्षा मुख्यत: ग्रीष्म ऋतु में होती है शीत काल शुष्क है।
  3. लघु ग्रीष्म काल युक्त शीत आर्द्ध  जलवायु (Dfc प्रकार) : – इस प्रकार की जलवायु सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश और असम ( हिमालय का पूर्वी भाग) के हिस्सों में पायी जाती है। शीत काल ठण्डा, आर्द्ध एवं लंबी अवधि का होता है। शीत काल में तापमान 10 ℃ तक होता है।
  4. टुण्ड्रा तुल्य जलवायु (ET प्रकार) – यहाँ तापमान सालभर 10 ℃ से कम रहता हैै। शीतकाल में हिमपात के रूप में वर्षों होती है। इसके अंतर्गत – अत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र, कश्मीर,  लद्दाख, हिमाचल प्रदेश के 3000 से 5000 मी॰ ऊँचाई वाले क्षेत्र शामिल हैं।
  5. ध्रवीय तुल्य जलवायु (E प्रकार) : यहाँ तापमान साल भर 0 ℃ से कम (हिमाच्छारित प्रदेश ) होता है। इसके अन्तर्गत हिमालय के पशिचमी और मध्यवर्ती भाग में 5000 मी० से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्र। [ J & K एवं H.P के उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्र ]

भारतीय मानसून की उत्पति के सिद्धांत

मानसून की उत्पति से संबधित चार प्रमुख सिद्धांत दिए गए हैं-

  1. तापीय सिद्धांत
  2. विषुवतीय पछुआ पवन सिद्धांत
  3. जेट स्ट्रीम सिद्धांत
  4. अलनीनो सिद्धांत

मानसून की उत्पति का तालीय सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार, मानसूनी पवनों की उत्पति का मुख्य कारण तात्पर्य। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्द्ध में लम्बवत पड़ती हैं। इससे यहाँ एक वृहत निम्न दाब (LP) का निर्माण होता है। इस निम्न दाब के कारण उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनें  अनुपस्थित हो जाती हैं जो कि 5° से 30° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के बीच सालभर चलती हैं।

तापीय विषुवत रेखा उत्तर की ओर खिसक जाती है इस कारण द० पू० व्यापारिक पवनें विषुवत रेखा को पार कर उत्तरी गोलार्द्ध में आ जाती हैं। फेरेल के नियमानुसार उत्तरी गोलार्द्ध में आने पर ये पवन अपनी दांहिनी और (Right Hand side) अर्थात् उत्तर पूर्व की ओर मुड़ जाती हैं तथा संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर प्रवाहित होने लगती हैं। चूंकि ये पवन लम्बी  समुंद्री यात्रा कर आ रही होती हैं अतः  जलवाष्प युक्त होती है।

ये द० पू० मानसूनी पवन भारतीय उपमहाद्वीप में दो भागों में बंटकर वर्षा ऋतु लाती हैं।प्रथम, अरब सागर शाखा पश्चिमी घाट के पश्चिमी दाल पर तथा द्वितीय, बंगाल की खाड़ी शाखा के द्वारा अंडमान निकोबार द्वीप समूह एवं उत्तर पूर्व भारत में भारी वर्षा होती है।

बंगाल की खाड़ी शाखा उत्तर – पिश्चम भारत के निम्न दाब क्षेत्र की और  अभिसरित होती है। पूर्व से पीश्चम की ओर जलवाष्प की कमी के साथ ही वर्षा की मात्रा में भी कमी होती जाती है।

व्यापरिक पवनें – व्भापारिक पवनें 5° से 30 ° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशो के बीच चलने वाली पवनें हैं जो 35° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश (उच्च दाब) से O ° असांश (निम्न दाब) के बीच चलती है।

शीत ऋतु में सूर्य की किरणों मकर रेखा पर सीधी पड़ती हैं। इससे भारत के उत्तर पश्चिमी भाग में अरब सागर व बंगाल की खाड़ी के तुलना में अधिक ठण्ड होने के कारण उच्च दाब क्षेत्र का निर्माण ( उत्तर –  पश्चिम भारत में) एवं अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब निर्माण ( ठण्ड कम होने के कारण ) होता है इस कारण मानसूनी पवनें विपरीत दिशा में (H.P.से L.P की तरफ) बहने लगती है।

जाड़े की ऋतु में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनें पुनः चलने लगती हैं। यह उत्तर पूर्वी मानसून  लेकर आता है। तथा बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण कर तमिलनाडु के तट पर वर्षा करती हैं।

2.मानसून की उत्पति का विषुवतीय पछुआ पवन सिद्धांत या प्रतिविषुवतीय पछुआ पवन सिद्धांत :-

 इसका प्रतिपादन फ्लोन के द्वारा किया गया है। इनके अनुसार विषुवतीय पछुआ पवन ही दक्षिण – पशिचम मानसूनी हवा है। इसकी उत्पति अंतः ऊष्ण अभिसरण के कारण होती है।

ITCZ :- उ० पू० व्यापारिक पवनों एवं द० पू० व्यापारिक पवन का मिलन स्थल अंतर – उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र  (ITCZ) होता है। यहाँ दोनो पवनों के मिलने विषुवतीय पछुआ पवनों की उत्पति होती है।

फ्लोन ने मानसून की उत्पत्ति हेतु तापीय प्रभाव को प्रमुख माना है।

  • – ग्रीष्म काल में तापीय विषुवत रेखा के उत्तरी खिसकान के कारण अंतः ऊष्ण अभिसरण (ITCZ) विषुवत रेखा के उत्तर में होता है।  विषुवतीय पछुवा पवनें अपनी दिशा संशोधित कर भारतीय उपमहाद्वीप पर बने निम्न दाब की ओर प्रवाहित होने लगती है। यह दक्षिण –  पश्चिम मानसून को जन्म देती है।
  • – शीत ऋतु में सूर्य के दक्षिणायन होने पर निम्न दाब क्षेत्र, उच्च दाब, क्षेत्र मे बदल जाता है तथा उ० पू० व्यापारिक पवनें पुनः गतिशील हो जाती हैं।

3.जेट स्ट्रीम सिद्धांत –

इस सिद्धांत का प्रतिपादन येस्ट ( yest) द्वारा किया गया है। जेट स्ट्रीम ऊपरी वायुमण्डल ( 9 – 18 km) के बीच अति तीव्रगाती वायु प्रवाह प्रणाली है। मध्य भग में इसकी गति अधिकतम (340 Kmp hr) होती हैं जो निम्न वायुमण्डल के मौसम को प्रभावित करती हैं। 

भारत में आने वाले दक्षिण – पश्चिम मानसून का संबंध उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम से है। यह 8° N से 35 ° N अक्षाशो के मध्य चलती है। उत्तर पूर्वी मानसून का संबन्ध ( शीतकालीन मानसून ) उपोष्ण पशिचमी (पछुआं) जेट स्ट्रीम से है। यह 20° से 35 ° उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों अक्षांशो के मध्य चलती है।

पछुआ ( उपोष्ण  पश्चिमी ) जेट स्ट्रीम द्वारा उत्तर पूर्वी मानसून की उत्पतिः

शीतकाल में उपोष्ण  पश्चिमी (पछुआ) जेट स्ट्रीम संपूर्ण  पश्चिमी तथा मध्य एशिया में पश्चिम से पूर्व दिशा में प्रवाहित होती है। तिब्बत का पठार इसके मार्ग में अवरोधक का कार्य करता है एवं इसे दो।भागों में बांट देता है। एक शाखा तिब्बत के पठार के उत्तर से उसके समानान्तर बहने लगती है। दूसरी, दक्षिणी शाखा हिमालय के दक्षिण में पूर्व की ओर बहती है।

दक्षिणी शाखा की माध्य स्थिति में लगभग 25 °N अक्षांश के ऊपर होती है। इसका दाब स्तर 200 से 300 मिली बार होता है। पश्चिमी विक्षोभ जो भारत में शीत ऋतु मे अता है, इसी जेट पवन द्वारा लाया जाता है। रात के तापमान में वृद्धि इन विक्षेभों के आने का सूचक है।

पशिचमी जेट स्ट्रीम ठण्डी हवा का स्तंभ होता है जो सतह पर हवाओं को धकेलता है। इससे सतह पर उच्च दाब का निर्माण होता है [ भारत के उत्तर  पश्चिमी भाग में ] ये शुष्क हवाएं बंगाल की खाड़ी [तुलनात्मक रूप से तापमान अधिक होने के कारण निम्न दाब क्षेत्र ] की ओर प्रवाहित होती हैं। इन हवाओं के द्वारा ही शीतकाल में उत्तर प्रदेश एवं बिहार में शीत लहर चलती है। बंगाल की खाड़ी में पहुंचने के बाद ये हवाएँ अपने दाहिने मुड जाती हैं और मानसून का रूप ले लेती हैं। जब पवन  तमिलनाडु के तट पर पहुंचती हैं तो बंगाल की खाड़ी से ग्रहण किए जलवाष्प की वर्षा तमिलनाडु में करती है।

– ” उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम द्वारा दक्षिण पश्चिम मानसून की उत्पीतः –

गर्मी में  पश्चिमी जेट स्ट्रीम भारतीय उपमहाद्वीप पर नहीं बहती है। इसका खिसकाव तिब्बत के पठार के उत्तर की ओर हो जाता है। इस समय भारत के ऊपरी वायुमण्डल में ऊष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम चलती है। उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम की उत्पति का कारण मध्य एशिया एवं तिब्बत के पठारी भागों के अत्यधिक गर्भ होने को माना जाता है।

तिब्बत के पठार से गर्म होकर ऊपर उठने वाली हवाओ में शोभमण्डल के मध्य भाग में घाड़ी की सुई की दिशा में चक्रीय परिसंचरण प्रारम्भ हो जाता है। यह ऊपर उठती वायु क्षोभ सीमा के पास दो अलग – अलग धाराओं में बट जाती है। इनमें से एक विषुवत वृत्त की ओर पूर्वी जेट स्ट्रीम के रूप में चलती है तथा दूसरी ध्रुव की ओर  पश्चिमी जेट स्ट्रीम के रूप में चलती है।

पूर्वी जेट स्ट्रीम भारत के ऊपरी वायुमण्डल में द० प० दिशा की ओर बहती हुई अरब सागर में नीचे बैठने लगती है। इससे वहाँ वृहत उच्च दाब का निर्माण होता है। इसके विपरीत भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर जब ये गर्म जेट स्ट्रीम चलती है। इसके विपरीत भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर की ओर खींच लेती हैै। यहाँ वृहत निम्न दाब का निर्माण करती है। इस निम्न दाब को भरने के लिए अरब सांगर के उच्च भार क्षेत्र से हवाएं उत्तर पूर्व की ओर चलने लगाती हैं। यही दक्षिण पशिचमी मानसून पवन है।

 

उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम द्वारा द० प० मानसून की उत्पत्ति

– उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम के कारण ही भारत में मानसून – पूर्व उष्ण कतिबंधीय चक्रवात आते है। वरन् अनियमित भी है। जब यह भारत के वृहत क्षेत्र के ऊपर लम्बी अवधि तक चलती है तो बाद की स्थिति बनती है। जब ये हवाएं कमजोर होती हैं तो सूखा आता हैै।

  1. एलनिनो सिद्धांत – लगभग 3 से 8 वर्षों के अन्तरात पर महासागरों तथा वायुमण्डल में एक विशिष्ट उथल पुथल होती है। इसकी शुरुआत पूर्वी प्रशांत महासागर के पेरू के तट से होती है। पेरू के तट पर हम्बोल्ट या पेरू की जलधारा ( ठण्डी जलधारा ) प्रवाहित होती है। यह जल धारा दक्षिण अमेरिका तट से दूर उत्तर की ओर प्रवाहित होती है। हम्बोल्ट जलधारा की विशेषता शतिल जल का गहरई से ऊपर की ओर आना (upwelling) है। विषुवत रेखा के पास यह दक्षिण विषुवत रेखा जलधारा के रूप में प्रशांत महासागर के आर पार  पश्चिम की ओर मुड़ जाती है।

एंलनीयो के आने के साथ ही ठण्डे पानी का गहराई से ऊपर आना बंद दो जाता है एवं ठण्डे पानी का प्रतिस्थापन पश्चिम से आने वाले गर्म जल से हो जाता है। अब पेरू की ठण्डी जलधारा का तापमान बढ़ जाता है। इसके गर्म जल के प्रभाव से प्रथमतः दक्षिणी विषुवतीय गर्म जलधारा का तापमान बढ़ जाता है अतः सम्पूर्ण मध्य प्रशांत का जल गर्म हो जाता हैै तथा वहाँ निम्न दाब का निर्माण होता है। जब कभी इस निम्न दाब का विस्तार हिन्द महासागर के पूर्वी मध्यवर्ती क्षेत्र तक होता है तो यह भारतीय मानसून की दिशा को संशोधित कर देती है। इस निम्न दाब की तुलना में भारतीय उपमहाद्वीप के स्थलीय भाग पर बना निम्न दाब (ग्रीष्म ऋतु में) तुलनात्मक रूप से कम होता है। अतः अरब सागर के उच्च दाब क्षेत्र क्षेत्र से हवाओ का प्रवाह, दक्षिण- पूर्वी  हिंदमहासागर की ओर होने लगता है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप में सूखे की स्थिति बनती है। इसके विपरीत जब एलनिनो धारा का प्रभाव मध्यवर्ती प्रशांत तक सीमित रहता है तो द० प० मानसून पवनों का मार्ग बाधित नहीं होता तथा भारत में भरपूर वर्षा होती है।

दक्षिण – पशिचम मानसून :- 

सामान्यतः भारत में मानसून का समय जून से सितम्बर तक रहता है। इस समय उत्तर  पश्चिमी भारत तथा पाकिस्तान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। अंत उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) उत्तर की ओर खिसकता हुआ शिवालिक के पर्वत पार तक चला जाता है। इसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर सिंधु गंगा मैदान में एक लम्बाकार निम्न दाबीय मेखला का निर्माण होता है, जिसे मानसून गर्त (trough) हैं। इस निम्न ढाब को भरने के लिए दक्षिणी गोलार्द्ध में चलने वाली द० पू० वाणिज्यिक पवन (Trade winds) विषुवत रेखा को पार का पूर्व की ओर मुड़ जाती है। (फेरेल के नियमानुसार) तथा दक्षिणी – पश्चिमी मानसूनी पवन का रूप ले लेता है।

भारत में दक्षिणी –  पश्चिमी मानसून की उत्पती का संबंध उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम से है। दक्षिणी –  पश्चिमी मानसून भारत में सर्वप्रथम अंडमान एवं निकोबार तट पर 25 मई को पहुंचता है। फिर 1 जून को चेन्नई एवं तिरुअनन्तपुरम तक पहुंचता है। 5 से 10 जून के बीच कोलकाता एवं मुंबई को छूता है। 10 से 15 जून के बीच के बीच पटना, अहमदाबाद, नागपुर तक पहुंचता है। 15 जून के बाद लखनऊ , दिल्ली, जयपुर जैसे शहरों में पहुंचता है।

प्रायद्वीपीय भारत में दस्तक देने के बाद दक्षिण – पश्चिम मानसून मानसून दो शाखाओं में बंट जाता है-

i) अरब सागरीय शाखा

ii) बंगाल की खाड़ी शाखा

i) भारतीय द० प० मानसून  की अरब सागरीय शाखाः द० प० मानसून की यह शाखा पशिचमी घाट की उच्च भूमि में लगभग समकोण पर दस्तक देती है। अरब सागर शाखा द्वारा भारत के पश्चिमी तट,  पश्चिमी घाट पर्वत, महाराष्ट्र गुजराज एवं मध्यपदेश के कुध हिस्सों में वर्षा होती है।

– अब सागर शाखा द्वारा भारत के  पश्चिमी घाट पर्वत के  पश्चिमी ढाल पर तटीय भाग की तुलना में अधिक वर्षा होती है। उदाहरणस्वरूप महावलेश्वर में 650 वर्षा होती है जबकि मुंलई में मात्रा 190 cm  वर्षा होती है।  पश्चिमी घाट पर्वत के पूर्वी भाग में वर्षा की मात्रा काफी कम होती है क्योंकि यह वृष्टि छाया प्रदेश (Rain shadow Area) है। पुणे में मात्र 60 cm  वर्षा होती है। अरब  सागर शाखा राजस्थान से गुजरती हुई हिमालय से टकारती है तथा जम्मू कश्मीर एवं हिमायल प्रदेश के पर्वतीय ढ़ालों पर वर्षा करती है। राजस्थान से गुजरने के बावजूद इस मानसूनी शाखा द्वारा यहाँ वर्षा नही हो पाती इसके दो प्रमुख कारण हैं –

  • अरावली पर्वत माला की दिशा का इन मानसूनी पवनों के प्रवाह की दिशा के समानान्तर होना।
  • सिंध प्रदेश (पाकिस्तान) से आने वाली गर्म एवं शुष्क हवाएं मानसूनी पवनों की सापेक्षिक आर्द्धता को कम कर देती हैं। जिससे वायु संतृप्त नहीं हो पाती।

i) अरब सागरीय शाखा का वृाष्टि छाया क्षेत्रः  पश्चिमी घाट पार करने के पश्चात् वर्षा लाने वाली वायु धाराएं पूर्वी ढ़लानों पर ऊपर की ओर चली जाती हैं। इसके फलस्वरूप वृाष्टि छाया क्षेत्र ( Rain Shadow Area) का निर्माण होता है। पहाड़ की ऊँचाई जितनी अधिक होगी, उतना ही अधिक वृाष्टि छाया क्षेत्र का निर्माण होगा।

ii) द० प० मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखाः

मानसून की यह शाखा श्री लंका से इंडोनेशिया द्वीप समूहों के सुमात्रा द्वीप तक सक्रिय रहती हैै। बंगाल की खाड़ी शाखा दो धाराओं में आगे बढ़ती है। इस शाखा की उत्तरी धारा मेघालय में स्थित खासी पहारड़ेयों में दस्तक देती है तथा इसकी दूसरी धारा निम्न दबाव द्रोणी ( trough ) के पूर्वी छोर पर बायीं ओर मुड़ जाती है। यहाँ से यह हवा की धारा हिमालय की दिशा के साथ साथ दक्षिण पूर्व से उत्तर –  पश्चिम दिशा में बहती है। यह धारा भारत के मैदान क्षेत्रों में वर्षा करती है।

– उत्तर मैदानी क्षेत्र में मानसूनी वर्षा को  पश्चिम से बहने वाले चक्रवाती गर्त या  पश्चिमी हवाओ से और अधिक बल मिलता है।

– मैदानी इलाकों को पूर्व से पश्चिम से बहने वाले चक्रवाती गर्त या पश्चिमी हवाओं से और अधिक बल मिलता है।

– उत्तर मैदानी क्षेत्र में मानसूनी वर्षा को  पश्चिम से बहने वाले चक्रवाती गर्त या  पश्चिमी हवाओं से और अधिक बल मिलता है।

– मैदानी इलाकों में पूर्व से  पश्चिम और उत्तर से दक्षिण में वर्षा की तीव्रता में कमी आती है। पश्चिम में वर्षा में कमी का कारण नमी के स्त्रोत से दूरी का बढ़ना है। दूसरी ओर उत्तर से दक्षिण में वर्षा की तीव्रता में कमी की वजह नमी के स्त्रोत का पर्वतों से इरी का बढ़ना है।

– अरब सागरीय शाखा एवं बंगाल की खाड़ी शाखा दोनों शाखाएं छोटा नागपूर के पठार में मिलती हैं।

– अरब सागरीय मानसून शाखा, बंगाल की खाड़ी शाखा से अधिक शक्तिशाली है। इसके दो प्रमुख कारण हैं –

  • अरब सागर बंगाल की खाड़ी से आकार में बड़ा है।
  • अरब सागर की अधिकांश शाखा भारत में पड़ती है जबकि बंगाल की खाड़ी शाखा से म्यांमार, मलेशिया , और थाइलैण्ड तक चली जाती है।

दक्षिण  पश्चिम मानसून अवधि के दौरान भारत का पूर्वी तटीय मैदान (विशेष रूप से तमिलनाडु) तुलनात्मक रूप से शुष्क रहता हैै। क्योंकि यह मानसूनी पवनों के समानान्तर स्थित है और साथ ही यह अरब सागरीय शाखा के वृष्टि छाया क्षेत्र में पड़ता है।

उत्तर पूर्व मानसून या मानसून की वापसी

सिताम्बर के अंत तक उत्तर पश्चिम में बना निम्न दवाब कमजोर होने लगता है और अन्ततः वह विषुवत रेखीय प्रदेश की तरफ चला जाता है। चक्रवाती अवस्थाओं के स्थान पर प्रति चक्रवाती अवस्थाएं आ जाती हैं। परिणामरूवरूप, हवाएँ उत्तरी क्षेग से दूर बहना शुरु कर देती है। उसी समय विषुवत रेखा के दक्षिण में सूरज आगे बढ़ता नजर आता है। ( अन्तर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) भी विषुवत रेखा की ओर आगे बढ़ता है। उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में हवांए उत्तर पूर्व से दक्षिणी  पश्चिम दिशा में बहती है। यह स्थिति अक्टूबर से मध्य दिसम्बर तक लगातार बनी रहती है जिसे मानसून की वापसी या फिर उत्तर पूर्व मानसून कहते हैं। दिसम्बंर के अंत तक, मानसून पूरी तरह से भारत से जा चुका होता है।

बंगाल की खाड़ी के ऊपर से वापस जा रहा मानसून, मार्ग में आर्दता नमी ग्रहण कर लेता है जिससे अक्टूबर – नबम्बर में पूर्वी या तटीय उड़ीया, तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ हिस्से में वर्षा होती है।

अक्टूबर में बंगाल की खाड़ी में निम्न दवाब बनता है, जो दक्षिण की ओर बढ़ जाता है और नवम्बर में उडीसा और तमिलनाडु तट के बीच फंस जाने से भारी वर्षा होती है।

मानसून में रुकावट : वर्षा ऋतु में, जुलाई और अगस्त महीने में कुछ ऐसे समय होता है जब मानसून कमजोर पड़ जाता है। बादलों का बनना काम हो जाता है और विशेष रूप से हिमालयी  पहाड़ी और दक्षिण पूर्व प्रायुदीप के ऊपर वर्षा होनी बन्द हो जाती है कि ये रूकावटें तिब्बत के पठार की कम ऊँचाई की वजह से आती हैं। इससे मानसून गर्त उत्तर की ओर मुड जाता है।

इस अवधि में जहाँ पूरे देश को बिना वर्षा के ही संतोष करना पड़ता है तब उप हिमालयी प्रदेशों एवं हिमालय के दक्षिणी ढलानों में भारी वर्षा होती हैं।

–   पश्चिमी विक्षोभ ( Western Disturbance): आमतौर पर जब आकाश साफ रहता है परन्तु  पश्चिम दिशा से हवाएं भूमध्य सागर से आती है और इसका, ईरान अफगानिस्तन और पाकिस्तान को पार करने के पश्चात् भारत में प्रवेश करती हैं।

ये हवाएं राजस्थान, पंजाब और हरियाणा मैं तीव्र गति से बहती अरुणाचल प्रदेश तक पहुंच जाती हैं जिससे गंगा के मैदान इलकों मे हल्की वर्षा और हिमालयी पट्टी में हिम वर्षा होती है।

यह हटना मुख्य रूप से शीत ऋतु में होती है क्योंकि इस समय उत्तर  पश्चिम भारत में एक क्षीण उच्च दाब का निर्माण होता है। इसी समय भारत पर  ‘पश्चिमी जेट स्ट्रीम ‘ का प्रभाव होता है जो भूमध्य सागर से उठने वाले शीतोष्ण चक्रवात को भारत में लाती है। इसे ही ‘पश्चिमी विक्षोभ’ कहते है। इससे मुख्य रूप से प्रभावित राज्य  पंजाब हरियाणा,  पश्चिमी उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू कश्मीर हैं। इससे होने वाली वर्षा रबी की फसल ( गेहूँ etc.) के लिए बहुत उपयोगी हैै। यह वर्षा ” मावठ” नाम से भी जानी जाती है।

भारत की ऋतुएं

भारतीय मौसम विभाग द्वारा भारत की जलवायु को चार अतओं में विभाजित किया गया है-

1) शीत ऋतु

2) ग्रीष्म ऋतु

3) वर्ष ऋतु

4) शरद् ऋतु

शीत ऋतुः इसका काल मध्य दिसम्बर से फरवरी ल्क माना जाता है। इस समय सूर्य स्थिति दक्षिणायन हो जाती है। अतः उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित भारत का तापमान कम हो जाता है। इस ऋतु में समताम रेखाएं पूर्व से पश्चिम की ओर प्रायः सीधी रहती है। इस ऋतु में समताप रेखाएँ पूर्व से  पश्चिम की ओर प्रायः सीधी रहती है। 20 ℃ की समताप रेखा भारत के मध्य भाग से गुजरती है। इस ऋतु में भूमध्य सागर से उठने वाला शीतोष्ण चक्रवात ‘ पशिचमी जेट स्ट्रीम के सहारे भारत में प्रवेश करता है। इसे पश्चिमी जेट स्ट्रीम के सहारे भारत में प्रवेश करता है। इसे ‘ पश्चिमी विक्षोभ’ कहते हैं। यह पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, प० उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू कश्मीर में वर्षा करवाता है। शीतकाल में होने वाली यह वर्षा “मावठ” कहलती है। यह वर्षा रबी की फसल के लिए उपयोगी है।

– गीष्म ऋतु : यह ऋतु मार्च से मई तक रहती है। सूर्य के उत्तरायण होने से सारे भारत में तापमान बढ़ जाता है। इस ऋतु में उत्तर और उत्तर परिचमी भारत मे दिन के समय तेज गर्म एवं शुष्क हवाएँ चलती है। जो ‘ लू ‘ के नाम से प्रसिद्ध है। इस ऋतु में सूर्य के क्रमशः उत्तरायण होते जाने के कारण अन्तर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) उत्तर की ओर खिसकने लगता है एवं जुलाई में 25 ° अक्षांश रेखा को पर कर जाता है।

इस ऋतु में स्थलीय शुष्क एवं गर्म पावन जब समुद्री आई पवनों से मिलती है तो वो उन जगहों पर प्रचण्ड तूफान की उत्पति होती है। इसे मानसून सर्व चक्रवात ( Pre Monsoon cyclone) के नाम से जाना जाता है।

भारत में मानसून पूर्व चक्रवात ( Pre Monsoon Cyclone) के स्थानीय नामः

नार्वेस्टर – पूर्वी भारत ( प० बंगाल, बिहार, झासखण्ड, उडीसा) यह चाय, जुट और चावल की खेती के लिए लाभपद है।

काल वैशाखी – परिचम बंगाल ( नावैस्टर का स्थानीय नाम )

चेरी ब्लाँसम – कर्नाटक एवं केरल ( काँफी के फूलों के खिलने में सहायक )

आम्र वृष्टि / आम् बौछार, आम् वर्षा : दक्षिण भारत ( आम के जल्दी पकने में सहाभक )

बोर्डोचिल्ला – नावैस्टर  का असम में स्थानीय नाम

3) वर्षा ऋतु: इस ऋतु का समय जून से सितम्बर तक रहता है। इस समय उत्तर  पश्चिमी भारत तथा पाकिस्तान में निम्न वायुदान का क्षेत्र बन जाता है ( तापमान अधिक होने के कारण )। अतः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) उत्तर की ओर खिसकता हुआ शितालिक के पर्वतवाद तक चला जाता है। एवं गंगा के मैदानी क्षेत्र में निम्न दाव बन जाता है इस दाल को भरने के लिए द० पू० व्यापरिक पवनें विषुवत रेखा को पार कर द० प० मानसूनी पवनें के रुप में भारत में प्रवेश करती है। ये द० प० मानसूनी पवनें दो शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं। पहली शाखा, अरब सागरीय शाखा भारत के  पश्चिमी घाट पर्वत, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू कश्मीर में वर्षा करती हैै। दूसरी शाखा, बंगाल की खाड़ी शाखा, उत्तर – पूर्वी भारत, पूर्वी भारत एवं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखण्ड आदि भागों में वर्षा करती है।

– गारो, खासी एवं ज्यान्तिया पहाडियां की पनुमा आकृति में फैली हैं। एवं समुद्ध की ओर खुली हुई हैं। अतः बंगाल की  खाड़ी से आने  वाली हवाएँ यहाँ फस जाती हैं और अत्याधिक वर्षा करती हैं। 

– गोरा, खासी एवं जयान्तिया पहाडिया की पनुमा आकृति में फैली हैं, एक समुद्र की ओर खुली हुए हैं। अतः बंगाल की खड़ी से आने वाली हवाएँ यहाँ फस जाती हैं और अत्यधिक वर्षा करती हैं।

– खासी पहाड़ी  के दक्षिणी भाग में स्थित ‘ मासिनराम’ संसार का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान है।

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